एक शिक्षिका का समर्पण, बदल गया सरकारी स्कूल का चेहरा

एक शिक्षिका का समर्पण, बदल गया सरकारी स्कूल का चेहरा

सिर्फ दो महीनों में 20 से बढ़कर 80-90 हुई बच्चों की उपस्थिति, संगीता मौर्या ने घर-घर जाकर जगाई शिक्षा की अलख

रायबरेली। (लेखक सचिन उपाध्याय)सरकारी स्कूलों को लेकर अक्सर तरह-तरह की धारणाएं सामने आती हैं, लेकिन रायबरेली की शिक्षिका संगीता मौर्या ने अपने समर्पण और मेहनत से यह साबित कर दिया कि बदलाव के लिए संसाधनों से ज्यादा सच्ची नीयत और मजबूत इरादे जरूरी होते हैं।

जुलाई 2025 में डीह ब्लॉक के पोठई गांव स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय में कार्यभार संभालने के समय विद्यालय में मुश्किल से 20 बच्चे नियमित रूप से पहुंचते थे। स्कूल में बच्चों की कम उपस्थिति और शिक्षा के प्रति उदासीनता के बीच संगीता मौर्या ने इसे चुनौती के रूप में लिया। उन्होंने बच्चों को स्कूल तक लाने के साथ-साथ अभिभावकों का विश्वास जीतने का अभियान शुरू किया।

वह घर-घर पहुंचीं और अभिभावकों से संवाद कर उन्हें समझाया कि सरकारी स्कूल में मिलने वाली निःशुल्क शिक्षा, मिड-डे मील और अन्य सरकारी योजनाएं बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उनकी मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी और स्कूल में बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई।

संगीता मौर्या की खासियत यह है कि वह बच्चों को केवल विद्यार्थी नहीं, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा मानती हैं। वह बच्चों के साथ जमीन पर बैठकर भोजन करती हैं, उनकी परेशानियां सुनती हैं और उनकी सेहत व व्यक्तिगत जरूरतों का भी ध्यान रखती हैं। उनके इसी अपनत्व ने बच्चों के मन से स्कूल का डर और झिझक दूर कर दी।

आज वही विद्यालय, जहां कभी मुश्किल से 20 बच्चे पहुंचते थे, वहां 80 से 90 बच्चे प्रतिदिन पढ़ने आने लगे हैं। स्कूल का वातावरण भी पूरी तरह बदल गया है। जहां कभी सन्नाटा पसरा रहता था, वहां अब बच्चों की चहल-पहल, हंसी और पढ़ाई की आवाजें सुनाई देती हैं।

सिर्फ स्कूल नहीं बदला, बच्चों के सपनों को दिशा मिली

संगीता मौर्या की कहानी किसी बड़े अभियान या भारी-भरकम बजट की कहानी नहीं है। यह कहानी है एक शिक्षिका के उस विश्वास की, जिसने बच्चों की शिक्षा को अपना मिशन बना लिया। उन्होंने यह संदेश दिया है कि शिक्षक यदि अपने दायित्व को नौकरी नहीं बल्कि जिम्मेदारी और सेवा के रूप में निभाए, तो सरकारी विद्यालय भी बच्चों के सपनों की मजबूत नींव बन सकते हैं।

संगीता मौर्या आज उन बच्चों के लिए सिर्फ शिक्षिका नहीं, बल्कि प्रेरणा, विश्वास और उम्मीद का नाम बन गई हैं। उनका प्रयास उन सभी शिक्षकों के लिए भी मिसाल है, जो सरकारी विद्यालयों को बेहतर बनाने का सपना देखते हैं।

सचमुच, बदलाव हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं आता—कभी-कभी एक समर्पित शिक्षक ही पूरी तस्वीर बदल देता है।

Soron Live 24
Author: Soron Live 24

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