‘विश्व सभ्यताओं के जनक: भारत’ शोध ग्रंथ पर इतिहासकार उमेश पाठक की विस्तृत समीक्षा, कहा— भारतीय इतिहास और सभ्यता पर गंभीर विमर्श की महत्वपूर्ण कृति

कासगंज उत्तर प्रदेश। इतिहासकार एवं तुलसी शोध संस्थान, सोरों सूकर क्षेत्र के कार्यकारी निदेशक उमेश पाठक ने डॉ. अखिलेश चन्द्र शर्मा द्वारा रचित शोध ग्रन्थ “विश्व सभ्यताओं के जनक: भारत” की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत करते हुए इसे भारतीय इतिहास, संस्कृति और सभ्यता के अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण कृति बताया है। उन्होंने ग्रन्थ के विभिन्न अध्यायों का विश्लेषण करते हुए उसके शोध पक्ष की सराहना की है, वहीं कुछ बिन्दुओं पर अपने प्रश्न और मतभेद भी दर्ज किए हैं।
उन्होंने बताया कि “विश्व सभ्यताओं के जनक: भारत” एक शोध ग्रन्थ है, जिसके लेखक डॉ. अखिलेश चन्द्र शर्मा हैं। इसका प्रकाशन प्राच्य विद्या शोध प्रकाशन, इन्दौर द्वारा किया गया है। ग्रन्थ की सहयोग राशि 300 रुपये तथा कुल पृष्ठ संख्या 184 है। इस ग्रन्थ का शोध आधार 131 ग्रन्थों के सन्दर्भों से पुष्ट किया गया है, जो लेखक के कथनों को प्रामाणिक आधार प्रदान करता है। इन सन्दर्भ ग्रन्थों में संस्कृत, हिन्दी तथा अंग्रेज़ी सहित अनेक भाषाओं के ग्रन्थ सम्मिलित हैं। लेखक ने अपने विचारों को और अधिक प्रमाणिक बनाने के लिए अनेक चित्र भी प्रकाशित किए हैं।
उन्होंने बताया कि प्रस्तावना से लेकर सन्दर्भ ग्रन्थ सूची तक यह शोध ग्रन्थ कुल 25 अध्यायों में विभाजित है। इसकी भूमिका गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार के पूर्व कुलपति डॉ. सुरेन्द्र कुमार ने लिखी है। भूमिका में उन्होंने लिखा है कि गत कुछ शताब्दियों में सुनियोजित और कूटनीतिक तरीके से भारत के गौरवशाली इतिहास को विकृत किया गया है। आर्य-अनार्य, आर्य-द्रविड़, आर्य-मूल निवासी, उत्तर-दक्षिण, हिन्दू-गैर हिन्दू जैसे भेद इस्लामिक, ईसाई और कम्युनिस्ट विचारधाराओं के प्रभाव से स्थापित किए गए। उन्होंने कहा है कि डॉ. अखिलेश चन्द्र शर्मा ने अपने शोध के माध्यम से इन धारणाओं को चुनौती दी है और उनका यह प्रयास सराहनीय है। भूमिका में यह भी कहा गया है कि भारतभूमि से सत्यनिष्ठ मनीषियों का उद्भव सदैव होता रहा है, जो सनातन आर्य दर्शन और “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” की भावना को पुष्ट करते हैं। मानव मात्र को मनु की सन्तान बताते हुए विश्व बंधुत्व की स्थापना का विचार भी व्यक्त किया गया है।
इतिहासकार उमेश पाठक ने समीक्षा में ग्रन्थ के प्रमुख बिन्दुओं की चर्चा करते हुए बताया कि लेखक ने इतिहास की व्याख्या “इति-ह-आस” अर्थात “ऐसा निश्चित रूप से हुआ” के रूप में की है। आचार्य शौनक के वृहद्देवता ग्रन्थ का उद्धरण देते हुए इतिहास की परिभाषा प्रस्तुत की गई है।
पृथ्वी पर प्रथम मनुष्यों की उत्पत्ति के विषय में लेखक का मत है कि मानव की उत्पत्ति आर्यावर्त के तिब्बत क्षेत्र में हुई, जहाँ से वे हरिद्वार, कुरुक्षेत्र और सरस्वती नदी के क्षेत्र में आए तथा इस क्षेत्र का नाम आर्यावर्त पड़ा। लेखक ने अपने अध्ययन में वेद, स्मृतियों तथा पुराणों को आधार बनाया है। हालांकि समीक्षा में उमेश पाठक ने उल्लेख किया है कि सृष्टि की उत्पत्ति तथा हिरण्याक्ष से पृथ्वी की मुक्ति के प्रसंग में पद्मपुराण के अध्याय 119 में वर्णित सूकरक्षेत्र संबंधी प्रसंग का उल्लेख ग्रन्थ में नहीं किया गया है। उन्होंने “पंच योजन विस्तीर्णे सूकरे मम मन्दिरे” श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि भूर्लोक, जम्बूद्वीप, भारतवर्ष और भरतखण्ड का विकास सूकरक्षेत्र के विस्तार के रूप में वर्णित है, जिस पर लेखक की दृष्टि नहीं गई।
उन्होंने बताया कि “वेद ज्ञान का प्रकाश” नामक अध्याय में चारों वेद, शतपथ ब्राह्मण, मनुस्मृति तथा इंग्लैण्ड के विद्वान मेंटरलिंक के कथनों के माध्यम से भारत को ज्ञान और विद्या का मूल स्रोत बताया गया है।
“मनुष्य सृष्टि का आरम्भ” अध्याय में मात्र चार पृष्ठ हैं, किन्तु 17 सन्दर्भ दिए गए हैं। इसमें मरीचि के पुत्र कश्यप की सन्तानों से मानव अधिवास स्थापित होने का उल्लेख है। समीक्षा में कहा गया है कि मनुस्मृति 10/43 और 10/44 में जिन जातियों का उल्लेख है, उन्हें लेखक ने क्षत्रिय जातियाँ लिखा है, जबकि मूल श्लोकों में “क्षत्रिय” शब्द का उल्लेख नहीं है।
“वैदिक ग्रन्थों में वर्ण व्यवस्था” अध्याय पर इतिहासकार उमेश पाठक ने अपने मतभेद स्पष्ट करते हुए लिखा है कि यह अध्याय लेखक का अपना आग्रह प्रतीत होता है और उनके विचार से इसका स्थान यहाँ नहीं होना चाहिए। इस अध्याय में छह पृष्ठ तथा 17 सन्दर्भ दिए गए हैं। लेखक ने पुरुष सूक्त को सम्पूर्ण रूप से लुप्तोपमा अलंकार बताया है, किन्तु समीक्षा में कहा गया है कि वेद मन्त्रों की प्रस्तुत व्याख्या से सभी पाठक सहमत नहीं हो सकते।
समीक्षा में आगे कहा गया है कि यदि भारतीय समाज में केवल योग्यता के आधार पर कार्य विभाजन था तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जैसी संज्ञाओं की आवश्यकता क्यों पड़ी। लेखक ने यह भी लिखा है कि “वर्ण” शब्द का अर्थ “चुनना” है, इसलिए वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित नहीं हो सकती। इस पर उमेश पाठक ने वामन कृष्ण आप्टे के संस्कृत-हिन्दी कोश तथा नालन्दा हिन्दी शब्दसागर का उल्लेख करते हुए कहा है कि इन शब्दकोशों में “वर्ण” का अर्थ “चुनना” नहीं दिया गया है।
उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण, छान्दोग्य उपनिषद, विश्वामित्र, मातंग ऋषि तथा मनु पुत्र नाभानेदिष्ठ के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा है कि ये उदाहरण वेदों से प्रत्यक्ष रूप से पुष्ट नहीं होते। साथ ही उन्होंने प्रश्न उठाया है कि चाण्डाल किस वर्ण के थे।
आपस्तम्ब धर्मसूत्र (2/2/4) के उद्धरण “आर्याधिष्ठाता वा शूद्राः…” का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रश्न किया है कि यदि शूद्र भी आर्य हैं तो “आर्यों के घर में शूद्र पाक सेवा करें” का आशय क्या है। इसी प्रकार उन्होंने यह भी लिखा है कि ग्रन्थ में शूद्रों को वेद अध्ययन और यज्ञादि में सहभागी बताया गया है, वहीं भगवान राम द्वारा शबरी भीलनी के बेर खाने का उल्लेख किया गया है, जिसे उन्होंने असत्य बताया है।
“प्राचीन सभ्यताओं के वैदिक आधार तत्व” अध्याय की चर्चा करते हुए उमेश पाठक ने लिखा है कि लेखक ने विश्व की विभिन्न सभ्यताओं में सनातन हिन्दू सभ्यता के चिह्नों की उपस्थिति दर्शाने का प्रयास किया है। इनमें स्वास्तिक चिन्ह, वैवस्वत मनु, जलप्लावन, भारतीय देवताओं की मान्यता, संस्कृत भाषा तथा वैदिक जीवन पद्धति का उल्लेख किया गया है। साथ ही मैक्समूलर के कथन का हवाला देते हुए कहा गया है कि हिन्दू, पार्शियन, यूनानी, रोमन, स्लाव, केल्ट तथा ट्यूटन जातियाँ आर्य परम्परा से सम्बद्ध रही हैं और विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में आर्य संस्कृति के तत्व विद्यमान हैं।
अपनी समीक्षा के अंत में इतिहासकार उमेश पाठक ने कहा कि ग्रन्थ के अन्य अध्यायों में लेखक का शोधपरक अध्ययन वंदनीय है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस ग्रन्थ का अनेक भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए तथा इसके विचारों पर व्यापक स्तर पर विमर्श होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक मानव समाज में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। अंत में उन्होंने लेखक डॉ. अखिलेश चन्द्र शर्मा को अपनी शुभकामनाएँ एवं सम्मान प्रकट करते हुए उनके शोध कार्य की सराहना की।
Author: Soron Live 24

