तीर्थ नगरी सोरों में वराह प्राकट्य महोत्सव धूमधाम से मनाया गया





भगवान वराह मंदिर में विराजमान
तीन दिवसीय कार्यक्रम में गंगा लहरी पाठ, सुंदरकांड, दुग्धाभिषेक और छप्पन भोग का हुआ आयोजन
तीर्थ नगरी सोरों शूकर क्षेत्र स्थित वराह मंदिर में तीन दिवसीय वराह प्राकट्य महोत्सव (वराह जयंती) भव्यता एवं श्रद्धा के साथ सम्पन्न हुआ।मंगलवार को समापन अवसर पर नगर पालिका अध्यक्ष रामेश्वर दयाल महेरे ने भगवान वराह की प्रतिमा का पूजन एवं दुग्धाभिषेक किया। देर शाम मंदिर को भव्य फूल बंगले एवं सतरंगी लाइटों से सजाया गया। भगवान को छप्पन भोग अर्पित किया गया तथा श्रद्धालुओं को पूरी-सब्जी एवं बूंदी का प्रसाद वितरित किया गया।
संध्या समय भगवान वराह की भव्य शोभायात्रा (संध्या फेरी) निकाली गई, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल हुए।
मंदिर सेवायत नरेश त्रिगुणायत ने बताया कि तीन दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम के अंतर्गत गंगा लहरी पाठ, सुंदरकांड पाठ, दुग्धाभिषेक एवं छप्पन भोग भंडारे का आयोजन हुआ।
गंगा वराह गण सभा के कार्यकर्ताओं ने श्रद्धालुओं की सुविधाओं का ध्यान रखा। वहीं बाहर सोरों पुलिस प्रशासन द्वारा सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की गई, जिसमें कोतवाली प्रभारी जगदीश चंद्र पुलिस बल के साथ तैनात रहे।
कार्यक्रम में महामंडलेश्वर आशुतोष आनंद,महंत विदेहानन्द, नरेश त्रिगुणायत, शंभू शंकर सहित वराह गण सभा के सदस्य मुकेश निर्भय, शिवम पुजारी, सुमित दिक्षित, आकाश तिवारी, बंशीधर द्विवेदी, आकाश उपाध्याय ज्वाला, राधा कृष्ण विजय, सुनील तिवारी, दयाशंकर तिवारी, ओम दर्शन शर्मा बबलू मोहल्लेदार, अनुभव चौधरी,राहुल निर्भय,रवि पाराशर, सविता गुप्ता,कमल कांत त्रिवेदी,ओमशिव मिश्रा, आदित्य काकोरिया आदि मौजूद रहे।
विशेष: भगवान वराह की कथा
हिंदू धर्म के अनुसार भगवान विष्णु के दशावतारों में तीसरा अवतार वराह के रूप में हुआ।
कथा है कि असुर हिरण्याक्ष ने पृथ्वी (भूदेवी) को पाताल लोक में ले जाकर समुद्र में छिपा दिया था। तब भगवान विष्णु ने वराह (सूअर) का रूप धारण कर सैकड़ों वर्षों तक जल में गोता लगाकर पृथ्वी की खोज की।
अंततः उन्होंने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर उठाकर समुद्र से बाहर निकाला और उसे पुनः अपने स्थान पर स्थापित किया।
➡️ यह कथा सत्य और धर्म की अधर्म पर विजय तथा सृष्टि के संरक्षण का प्रतीक मानी जाती है।
Author: Soron Live 24

