गोस्वामी तुलसीदास जी के साथ घोर छल
513 वीं तुलसी जयंती 11 अगस्त,2024( श्रावण शुक्ल सप्तमी,शुक्रवार,विक्रम संवत 1568,मोहल्ला योगमार्ग, शूकरक्षेत्र सोरों),
400 वां तुलसी निर्वाण दिवस (श्रावण शुक्ल सप्तमी,शनिवार, वि. सं.1680,अस्सी,काशी)
बुद्ध, महावीर, कबीर, रविदास, गुरुनानक आदि महापुरुषों ने सनातन की जिन कमियों को इंगित कर नए पंथ की स्थापना की, क्या ये पंथ उन कमियों/बुराइयों से बच पाए?
कभी भारत में तुलसी जयन्ती राष्ट्रीय त्योहार की तरह था।हर विद्यालय,विश्वविद्यालय में तुलसी जयन्ती धूमधाम से मनाई जाती थी।बच्चों में श्रीरामचरितमानस की चौपाई याद करने की अंत्याक्षरी प्रतियोगिता होती थी।हर मंदिर में श्रीरामचरितमानस का पारायण होता था।तुलसी जयन्ती की प्रतीक्षा होती थी।कथा प्रवचन होते थे।लेकिन आज तुलसी जयंती आएगी और आ के चली भी जायेगी, किसी को शायद ही पता चले, लेकिन कबीर जयंती, रविदास जयंती तो हम धूमधाम से मनाते हैं। तीनों ने अपना जीवन काशी में बिताया। तीनों ने मानवता, समाज और धर्म की सेवा की। तुलसी ने तो ऐसे कालजयी महाग्रंथ की रचना की जिसे हर घर में पढ़ा जाता है, पूजा जाता है, लेकिन तुलसी की इतनी उपेक्षा क्यों? बुद्ध का भी बनारस से जुड़ाव रहा है, लोग बुद्ध की बात करेंगे, कबीर को सराहेंगे, रविदास को पूजेंगे और तुलसी से बचकर निकल जायेंगे। जो लोग तुलसी के नाम पर नाम ऐश्वर्य कमाते हैं वे भी तुलसी जयन्ती से भाग जाते हैं।काशी में तो तुलसी जयन्ती की धूम होती थी।अनेक स्थानों पर तुलसी जयन्ती पखवारा मनाया जाता था। पखवारे में कवियों,विद्वानों,संगीतकारों और वक्ताओं की परीक्षा होती थी।देश में ऐसे बहुत से कवि,कथावाचक,संगीतकार,रचनाकार,शोधार्थी,विद्वान आज भी हैं जिन्होंने काशी के तुलसी जयन्ती समारोहों में अपनी प्रतिभा दिखा कर राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की है।अयोध्या में राममंदिर का निर्माण और राम राज्य के अलाप का आधार आखिर तुलसी ही तो हैं।
कभी भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय तुलसी जयन्ती मनाने के लिए प्रेरित भी करताथा।सरकारों की तरफ से राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर तुलसी जयन्ती मनाई जाती थी।प्रधानमंत्री से लेकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री तक तुलसी जयन्ती समारोह में भाग लेते थे।तुलसी जयन्ती समारोह एक राष्ट्रीय त्योहार की तरह था।लेकिन यह सब अब भूतकाल की बातें हो गईं।आखिर तुलसी से इतनी घृणा क्यों है?तुलसी को इतना उपेक्षित क्यों किया जा रहा है ?
तुलसी ने राम नाम गाया,राम का इतिहास लिखा तो अपराध क्या किया?क्या तुलसी का ब्राह्मण होना अपराध था?तुलसी का राम का दास होना गलत था? श्रीरामचरितमानस को घर -घर धर्मग्रन्थ बना देना कोई राष्ट्र द्रोह था?तुलसी अगर उपेक्षित होंगे तो संस्कार,परिवार,ममता,उदारता,सर्वकल्याण,एकजुटता,सर्वसमावेश ,भक्ति,विनम्रता आदि सब कुछ उपेक्षित होगा।राष्ट्र का राष्ट्रत्व बोध उपेक्षित होगा।तुलसी का भारतीय संविधान पर प्रभाव है।कभी तुलसी जयन्ती पर काशी में लालबहादुर शास्त्री जी प्रधानमंत्री भाग लेते थे।नेहरू और इंदिरा गांथी जैसे प्रधानमंत्री तुलसी जयन्ती पर देश को शुभकामनाएं देते थे।डा राजेन्द्र प्रसाद और राधाकृष्णन जैसे राष्ट्रपति तुलसी जयन्ती पर विचार प्रगट करते थे।जगजीवन राम जैसे राष्ट्रीय पुरुष और पं कमलापति त्रिपाठी जैसे विद्वान राजनीतिज्ञ तुलसी जयन्ती समारोह में श्री रामचरितमानस पर विचार प्रगट करते थे,जो राष्ट्रीय खबर बनती थी।तुलसी जयन्ती समारोह के दूसरे दिन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबार तुलसी जयन्ती समारोहों की खबरों से भरे रहते थे, लेकिन आज क्या हो गया?आने वाली पीढियां तुलसी जयन्ती ही भूल जायेंगी ।
अति महत्वाकांक्षी लोग यह भूल जाते हैं कि (मैनर्स )किसी खेत में पैदा नहीं होते।
तुलसी के नाम पर कथित साहित्यकारों को पिछलग्गू बनाकर चलाना थोथी राजनीति करने वाले दुकान पर बैठे ही शहर को नियंत्रित करने की हसरत पाल लेते हैं।
धन्यवाद प्रिंट मीडिया के लटके लफ़्फ़ाज के डायलॉग नई पीढ़ी को शायद लुभाते हैं।
बीज वपन कर्ता को नकारना उनकी अपनी राजनीति की विवशता हो सकती है।
राष्ट्रीय अध्यक्षों की नगरी में जहाँ सौ संस्थाएँ हों।
केवल मीडिया मैनेजमेंट का खेल है,
भारत सरकार के सेंट्रल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर से पहले सब पूँछ लो,फिर अपने नाम से अखबारबाजी करो,
यही आज कुछ नए नवेले कलमकारों का फ़ैशन बन गया है।पेशेंस तो जीरो है।
एषणा त्रय(लोकेषणा, पुत्रैषणा,वित्तेषणा) के अधीन जीवन कुछ सुचवाता कहाँ है!
09 दिनों बाद बिलों से फ़र्जी संस्थाएं निकल कर अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष/निदेशक बनकर जिलेभर में छपासू बनेंगे।तुलसी जयंती बाद सब फर्जीबाड़ा पुनः बिलों में 364 दिनों को कैद हो जाएगा।
“ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से”के मानसिक रोगी “घर के प्रोफेसर से सर्वाधिक परेशान रहते हैं।
हाय रे हतभाग्य,
बिना एकाध डडील के जिजमान की मानती भी नहीं होती। 512 वर्षों से चेतना शून्य समाज किस पर फूल रहा है?
नकल करेंगे,बिना नकल के पास भी कहाँ ?
इसीलिए प्रोफेसर बनना सबको दिवास्वप्न है। खुद Ph.D.न कर सके,प्रोफेसर न बन सके, पुत्र-पौत्रादि को बनावें।
हम करें तो वाह वाह,
तुम करो तो छी: छी: ?
” *संघे शक्ति कलौयुगे”*
” _वयं राष्ट्रे जाग्रयां पुरोहिता:”_
श्रीरामचरितमानस की ( 450) सार्ध चतु:शती का वर्ष है।
एक दूसरे की टांग खींचने वाले,/निंदा,/बुराई,/कमी ढूंढ़ने वाले,/ ईर्ष्या करने की पराकाष्ठा वाले- चंद पढ़े लिखे मन के काले लोग/ विचारों-साहित्य की चोरी करने वाले छपासू/”आन गाँव को जोगिया अपने गॉंव को सिद्ध” में रमने वाले, / गधों को पंजीरी खिलाने वाले,/ सौ सामाजिक संस्थाओं का शहर/”,,,,शहर सुहावनो ,,,,,”को गाने-गवाने वाले ,/अपनों की ही इज्ज़त तार तार करने वाला फ़ोटो खिंचाऊ , जिस समाज ने आज तक तीर्थ तथा तुलसी के नाम से केवल और केवल भोंपा ही बजाया है।विश्व स्तरीय फर्जी जेबी संस्थाओं के जनक – कल्मष हृदय वाले/
गोस्वामी तुलसीदास जी पर नाज़ कितनों को है। 400 साल बाद भी *कनवर को मिट्टी* की दरकार है”
(समझने वाले ही समझेंगे)
तुलसी के नाम पर साहित्यकार /कवि बनना आदि सूखी प्रसिद्धि सबको पानी है। संस्थाओं में ट्रस्टी भी बनना है,बयानबाजी भी करनी है।
“बिना चाश्नी के जलेबी का क्या अस्तित्त्व”
कोई बाहर का आकर कर दे,
हम बोर्ड,चौराहे पर बैठकर बाल की खाल निकालें।निंदा पुराण बाँचें।
जब तक सर्व स्वीकार नेतृत्त्व सामने नहीं आएगा,तव तक गाते रहो-
गुरुजी बेचुटटा के संग,,,,”
हथिनी के पागल होने के किस्से तो आज तक हैं।
ठोस काम कुछ नहीं।
“थोथा चना बाजे घना”
शब्द चोर चालाकी से विचार की,सोच की चोरी करते हैं,अपने को बड़का विद्वान सिद्ध करने में छल का आश्रय लेकर तात्कालिक क्षण को मुदित मन हो लेते हैं।
घर- घर में गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्मोत्सव ,सोल्लासपूर्वक मनाया जाय, नई पीढ़ी को चरित्र बताया जाय, तव तक यह जनांदोलन सफल कहाँ?
“नीम के पत्तों की चटनी कड़वी,
हरे धनिये,पोदीना के पत्तों की चटनी स्वादिष्ट।”
जब तक सनातन तीर्थ,शूकरक्षेत्र सोरों में 100 श्रीरामकथा के प्रबोधनकार/100 गोस्वामी तुलसीदास जी के चरित्र के कथाकार/100 प्रोफेसर (केन्द्रीय तथा राज्य विश्वविद्यालय में)/100 पत्रकार/ देशभर में नहीं फैलेंगे,तव तक सत्य की स्थापना अतिशय काठिन्य लिए है। इसी संकल्प की प्रतिपूर्ति में जीवन आहूत है।
मेरे राम इस बार प्रयोग धर्मी के रूप में दक्षिण भारत में कावेरी तथा अरब सागर के मध्य “राजापुर निर्माता:तुलसी” एवं “सोरों में जन्मे तुलसी” पर एक विशेष अभियान शुरू कर रहे हैं।
“जो घर बारे आपुनो,चले हमारे साथ”
“ज्ञान के पंथ कृपाण कै धारा,,,”
उत्तरप्रदेश सरकार ने राजापुर को जन्मभूमि के नाते 21 करोड़ की धनराशि विकास हेतु दी है,वह शूकर
क्षेत्र वासियों को चिढ़ाने के लिए।
सत्ता रात को दिन कर सकती है,बिजली के बल पर,लेकिन तुलसी का सत्य सोरों को छिपा नहीं सकती।
सरकारें आयेंगी, जायेंगी, साहित्य अमर,तुलसी अमर, सोरों तीर्थ सनातन है। सोरों में पृथ्वी की उत्पत्ति हुई है।सृष्टि का मूल है सोरों। क्रमशः,,,,,,जय सदगुरुदेव भगवान की। प्रोफेसर योगेंद्र मिश्र सदस्य,हिंदी सलाहकार समिति विधि तथा न्याय मंत्रालय,भारत सरकार।
Author: Soron Live 24

