एवीबीपी कार्यकर्ताओं पर लाठी चार्ज निंदनीय,सरकार पर सरकारी तंत्र हावी :गोविन्द तिवारी

*सोरों कासगंज* राष्ट्रसेवा की भावना में कार्यरत एबीवीपी के कार्यकर्ताओं पर बाराबंकी उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा ऐसे बर्बरता पूर्ण लाठीचार्ज करना पुलिस और विश्वविद्यालय की मिलीभगत का दुष्परिणाम है लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा आघात है। पुलिस व प्रशासन को आवश्यकता से अधिक शक्ति देना ही इस अमानवीय घटना का कारण बना है उत्तर प्रदेश के कुछ अधिकारी उत्तर प्रदेश सरकार से ऊपर है! क्योंकि अधिकारी पूर्ववर्ती सरकारों के इशारों पर कार्य कर रहे हैं ब्यूरोक्रेसी में अधिकांश अधिकारी पूर्ववर्ती सरकार के भरे हुए हैं और वह वर्तमान सरकार को फ़ेल करने का कार्य कर रहे है लेकिन सरकार समझने को तैयार नहीं है यहाँ तक कि इनके विधायक सांसद भी अधिकारियों से परेशान है अधिकारियों को ज़्यादा छूट अच्छा नहीं है। उत्तर प्रदेश में चयनित व्यवस्था ‘आईएएस’ यहां की चुनी हुई व्यवस्था नेतृत्व) पर भारी पड़ रही है। यातायात जुर्माना बढ़ोत्तरी होने से भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी हुई न कि यातायात के नियमों के पालन में सुधार आया। आज बलात्कार, चोरी, डकैती, लूट, हत्या जैसे अपराध पर लगाम ना लगाकर पुलिस का बस एक ही लक्ष्य बन गया है सिर्फ वाहन चालान। ट्रैफिक व्यवस्था से पुलिसकर्मियों का कोई लेना देना नहीं, बस उन्हें केवल चालान से मतलब है सरकार और मुख्यमंत्री की अच्छी मंशा के बावजूद जमीन पर योजनाओं का लाभ उस प्रकार नहीं पहुंच पा रहा है, जिस प्रकार पहुंचना चाहिये। मंत्री न तो सरकार की बैठकों में दिखते है और न ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में। कैविनेट का स्थान कुछ टीमो ने ले लिया है और सरकार के प्रवक्ता का स्थान एक चाटूकार अधिकारीयों ने। आज तक कोई भी सरकार जो अधिकारियों के चक्कर में पड़ी है, दुबारा नहीं आ पायी है। इसका कारण यह है कि अधिकारियों के ऊपर हर जगह नकेल कसने वाले सत्ताधारी पार्टी के पुराने कार्यकर्ता होते है,लेकिन सरकार जैसे ही इन अधिकारियों को प्रो हैंड देती है, सबसे पहले यह इन कार्यकर्ताओं को ही ठीक करते हैं। थानों पर स्थिति ऐसी है कि कोई अपने आपको भाजपा का कार्यकर्ता बता दे तो उसका काम होने को कौन को उल्टा कार्यवाई हो जाये? और यह हाल आम कार्यकर्ता से लेकर विधायकों तक का है। आम जनता की नजर में नेता यह है जिसकी थाने में धमक हो। यह धमक उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने कार्यकर्ताओं की कभी बनने ही नहीं दी तो समाजवादी पार्टी को यह स्थान कभी रिक्त करने की जरूरत भी नहीं पड़ी। यह सब नेताओं के अंदर भरे मूर्खतापूर्ण अपराधबोध ने कराया। सरकार में पहले ही कह दिया ‘नेताओं को न सुनें अधिकारी। आखिर लोकतांत्रिक देश में अधिकारी नेताओं को नहीं सुनेंगे तो किसकी सुनेंगे? इस अनावश्यक बयान के व्यापक प्रभाव से जनता में बहुत शिकायत न होने के बावजूद भी कार्यकर्ताओं के काम न होने और उससे बढ़ाकर इज्जत न मिलने से उनमें व्यापक निराशा है। स्वास्थ्य मंत्री ही सरकार की बैठकों में दिखाई नहीं देते, सम्भवतः बुलाया ही न जाता हो। चिकित्सा शिक्षा विभाग का यह हाल है कि उस विभाग के नौकरशाह ने अपने ही विभाग के खिलाफ जंग छेड़ रखी है! एक -एक कर अच्छे प्रशासकों को बीच कार्यकाल से बेईज्जत कर उठा फेंका और वैचारिक रूप से सरकार के विरोधियों को संस्थानों में बिठा दिया। इसलिये मुख्यमंत्री भी नौकरों के भरोसे पर चलने की कोशिश करते दिख रहे हैं। उन्हीं से काम कराना और उन्ही से उनके काम का फीडबैक लेना। इसके दो कारण हो सकते हैं, पहला यह कि मुख्यमंत्री स्वयं किसी और को आगे नहीं बढ़ने देना चाहते अथवा बाकी लोग खुद असहयोग की मुद्रा में हैं।कार्यकर्ता की पीड़ा कहीं फौजी पिट रहें है, कही छात्र पिट रहें है,
कही एबीवीपी के कार्यकर्ता पिट रहे कहीं भाजयुमो और भाजपा के नेता और कहीं जनता।
जनता या कार्यकर्ता के लिए अगर थाने या चौकी जाए तो भाजपा का परिचय अगर दे दिया तो वहां बैठा वर्दीधारी स्थापना के समय का स्वयंसेवक होने का परिचय दे देंगे या फिर अपने संबंध या रिश्तेदारी किसी मंत्री जी से बता देंगे और आपको अनुशासन का पाठ पढ़ा देगा और भगा देंगे लेकिन दलाल हर चौकी थाने पर 24 घंटे उपलब्ध रहेंगे और जो काम आप नहीं करा पाओगे वो तुरंत करवा देगा
प्रशासन ने योगी जी की सरकार को बदनाम करने की ठान रखी है। अगर इनपर लगाम नहीं लगाई गई तो परिणाम घातक होंगे। यह दोनों स्थिति नेतृत्वकर्ता के लिये ठीक नहीं है। मुख्यमंत्री ने शुरुआती सालों में अपनी मेहनत के बल पर जितना सरकार का नाम बनाया था, अधिकारियों ने उसे बर्बाद कर दिया है। फिलहाल सरकार के पास अपनी दिशा बदलने के लिये बहुत समय नहीं है। अधिकारियों द्वारा हेडलाईन मैनेजमेंट और मीडिया नियंत्रण से जमीनी स्थितियां नहीं सुधर सकती। कुछ महीने के भीतर यदि मुख्यमंत्री खुद को ब्यूरोक्रेट से मुक्त नहीं कर पाते तो दिनोंदिन जमीन पर पार्टी की स्थिति स्वयं कार्यकर्ता ही खराब करना शुरु कर देंगे, क्योंकि फिलहाल जो परिस्थिति है उसमें भाजपा ही भाजपा को हरा सकती है। इसके लिये ज्यादा कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं है।और इसका सबक मिल भी चुका है
अपने कार्यकर्ताओं का आनलाईन हालचाल का कार्यक्रम कराये। उनसे प्रत्यक्ष बात करें। फीडबैंक अधिकारियों से लेने के बजाय संगठन में ऐसे व्यक्तियों से ले जो एकांत में मीठा बोलने के बजाय कड़वी बात कह सके। विभित्र संगठनों के कोर टीम के साथ बातचीत करने का काम करें। अपने विधायकों को इतना शक्ति संपत्र अवश्य करें कि थाने पर उसके जाने पर मामले में उसकी बात गम्भीरता से सुनी जाये। उपरीक बारों को धरातल पर उतारने के लिये भी बहुत समय नहीं है, सरकार का फिर से उत्तर प्रदेश में वापसी राष्ट्रवादी मुद्दों को आगे बढ़ाने के लिये बेहद जरूरी है। इन सबके बीच सरकार के लिये अच्छी बात यही है कि एक भी स्वनिर्मित नेता भाजपा के विरोध में फिलहाल नहीं है।
Author: Soron Live 24

