पितृ पक्ष: पितरों की शांति और आशीर्वाद का पावन समय:आचार्य राहुल वशिष्ठ

पितृ पक्ष: पितरों की शांति और आशीर्वाद का पावन समय !

(फोटो आचार्य राहुल वशिष्ठ)

उत्तर प्रदेश!कासगंज। हिंदू धर्म में पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए मनाया जाने वाला पितृ पक्ष शीघ्र ही आरंभ होने वाला है। इसे पितृ पक्ष भी कहा जाता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों पितृलोक से पितरों की आत्माएँ पृथ्वी पर आती हैं और अपने वंशजों से तर्पण व अर्पण स्वीकार करती हैं। इस दौरान किया गया श्राद्ध और दान अक्षय फल प्रदान करता है।यह पूर्वजों की आत्मा की शांति हेतु तर्पण और पिंडदान का समय है।इसे पितृ पक्ष भी कहा जाता है।इसका उद्देश्य पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना है।माना जाता है कि इस समय पितर धरती पर आते हैं।श्राद्ध पक्ष में अर्पित अन्न और जल पितरों को तृप्त करता है।यह काल भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलता है।इस दौरान किए गए दान-पुण्य अक्षय फलदायी होते हैं।श्राद्ध से परिवार में सुख-समृद्धि और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। हर परिवार को अपने पितरों का स्मरण कर श्रद्धा भाव से श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए।

श्राद्ध क्या है? श्राद्ध की तिथियां 
श्राद्ध, पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है, उसे कहते हैं। यथा―
*‘श्रद्धया पितॄन् उद्दिश्य विधिना क्रियते यत्कर्म तच्छ्राद्धम्।’*
श्रद्धा से ही श्राद्ध शब्द की निष्पत्ति होती है―
*‘श्रद्धया दीयते यस्मात् तच्छ्राद्धम्’, ‘श्रद्धया कृतं सम्पादितमिदम्’, ‘श्रद्धया इदं श्राद्धम्’, ‘श्रद्धार्थमिदं श्राद्धम्’* आदि।
अर्थात् अपने पितृगण के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किये जाने वाले कर्म विशेष को श्राद्ध कहते हैं। इसे पितृयज्ञ भी कहा जाता हैं, जिसका वर्णन मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों, पुराणों तथा वीरमित्रोदय, श्राद्ध-कल्पलता, श्राद्धतत्त्व, पितृदयिता आदि अनेक ग्रन्थों में प्राप्त होता है। सामान्यतः श्राद्ध करने की तीन प्रक्रियाएँ हैं― 1). तर्पण, 2). पिण्डदान और 3). ब्राह्मण भोजन।

श्राद्ध हेतु स्थान―
जहाँ तक सम्भव हो, श्राद्ध तीर्थक्षेत्र में ही सम्पन्न करने चाहिये। जो तीर्थ भुक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाले हों, वो अतिश्रेष्ठ हैं। भगवान् विष्णु के अनुसार वो तीर्थ निम्न प्रकार हैं―
*“शालग्रामो द्वारका च नैमिषं पुष्करं गया।*
*वाराणसी प्रयागश्च कुरुक्षेत्रं च सूकरम्॥*
*गङ्गा च नर्मदा चैव चन्द्रभागा सरस्वती।*
*पुरुषोत्तमो महाकालस्तीर्थान्येतानि शंकरः॥*
*सर्वपाप हराण्येव भुक्तिमुक्तिप्रदानि वै।”*
अर्थात् शालग्राम, द्वारका, नैमिषारण्य, पुष्कर, गया, वाराणसी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सूकरक्षेत्र ( सोरों ), गंगा, नर्मदा, चन्द्रभागा, सरस्वती का तट, पुरुषोत्तमक्षेत्र तथा महाकाल का अधिष्ठान उज्जयिनी―ये सभी तीर्थ सब प्रकार के पापों का विनाश करने वाले एवं भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने वाले हैं। मनुष्यों को अपने ऊपर की तीन पीढ़ियों (पिता-माता, पितामह-पितामही और प्रपितामह-प्रपितामही) तथा ताताम्बादि (अन्य परिजनों) का श्राद्ध उनकी मृत्युतिथि के अनुसार ही अवश्य करना चाहिये।

श्राद्धकाल निर्णय―
श्राद्ध में कुछ बातें अत्यन्त महत्त्व की हैं, जैसे ‘कुतप’ वेला अर्थात् दिन का आठवाँ मुहूर्त (मध्याह्न 11:36 से 12:24 तक कुल 48 मिनट) श्राद्ध के लिये मुख्यरूप से प्रशस्त है। इसे ही ‘कुतप’ वेला कहते हैं। ‘कुत्सित’ अर्थात् पाप को संतप्त करने के कारण इसे ‘कुतप’ कहा गया है। यथा—
*दिवसस्याष्टमे भागे मन्दी भवति भास्करः।*
*स कालः कुतपो ज्ञेयः पितॄणां दत्तमक्षयम्॥*
(वसिष्ठस्मृति 11।33)
*दिवसस्याष्टमे भागे मन्दी भवति भास्करे।*
*स कालः कुतपो नाम पितॄणां दत्तमक्षयम्॥*
(महाभारत, आदिपर्व 93)

श्राद्ध में शोभन वस्तुएँ
ब्रह्मपुराण, विष्णुपुराण व मार्कण्डेयपुराण के अनुसार जौ, धान, तिल, गेंहूँ, मूँग, सावाँ, सरसों का तेल, तिन्नी का चावल, कँगनी, आम, अमड़ा, बेल, अनार, बिजौरा, पुराना आँवला, खीर, नारियल, फालसा, नारंगी, खजूर, अंगूर, नीलकैथ, परवल, चिरौंजी, बेर, जंगली बेर, मटर, कचनार, सरसों और इन्द्रजौ―इनको श्राद्ध में यत्नपूर्वक लेना चाहिये।

श्राद्ध में वर्जित वस्तुएँ
पद्मपुराण, कूर्मपुराण, विष्णुपुराण, महाभारत व व्याघ्रपादस्मृति के अनुसार राजमाष, मसूर, अरहर, गाजर, कद्दू, गोल-लौकी, बैंगन, शलजम, हींग, प्याज, लहसुन, काला-नमक, काला-जीरा, सिंघाड़ा, जामुन, पिप्पली, सुपारी, कुलथी, कैथ, महुआ, अलसी, पीली सरसों, चना―ये सब वस्तुएँ श्राद्ध में वर्जित हैं।

श्राद्धीय जिज्ञासा―
एक जिज्ञासा होती है कि श्राद्ध में दी गयी अन्नादि सामग्रियाँ पितरों को कैसे मिलती हैं, क्योंकि विभिन्न कर्मों के अनुसार मृत्यु के बाद जीव को भिन्न-भिन्न गति प्राप्त होती है?
इन प्रश्नों का उत्तर शास्त्र ने सुस्पष्ट दिया है कि नाम और गोत्र के सहारे विश्वेदेव एवं अग्निष्वात्त आदि दिव्य पितर हव्य-कव्य को पितरों को प्राप्त करा देते हैं। यदि पिता देवयोनि में हैं तो उन्हें दिया गया अन्न वहाँ अमृत होकर प्राप्त होगा, मनुष्ययोनि में अन्नरूप में, पशुयोनि में तृणरूप में, नागयोनि में वायुरूप में, यक्षयोनि में पानरूप में तथा अन्य योनियों में भी उसे श्राद्धीय वस्तु भोग जनक तृप्तिकर पदार्थों के रूप में प्राप्त होकर अवश्य तृप्त करती है। यथा―
“नाममन्त्रस्तथा देशा भवान्तरगतानपि।
प्राणिनः प्रीण्यन्त्येते तदाहारत्वमागतान्॥
देवो यदि पिता जातः शुभकर्मानुयोगतः।
तस्यान्नममृतं भूत्वा देवत्वेऽप्यनुगच्छति॥
मर्त्यत्वे ह्यन्नरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत्।
श्राद्धान्नं वायुरूपेण नागत्वेऽप्युपतिष्ठति॥
पानं भवति यक्षत्वे नानाभोगकरं तथा।”

किसका श्राद्ध कब करें
सौभाग्यवती स्त्री का श्राद्ध नवमी तिथि को करना चाहिये। यदि वंश में कोई व्यक्ति संन्यासी (यति) या वनवासी हुए हों तो उनका श्राद्ध द्वादशी तिथि को करना चाहिये। यदि कोई व्यक्ति तिर्यग्योनि (कुत्ता आदि पशु) के काटने, विष, शस्त्र, अग्न्यादि के घात से मरे हों तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को करना चाहिये। यदि किसी की मृत्यु स्वाभाविक चतुर्दशी तिथि को ही हुई हो तो उनका श्राद्ध अगले दिन अमावस्या को करना चाहिये। चतुर्दशी को श्राद्ध करने से कुल में निंदित संतान उत्पन्न होती है। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को मातामह (नाना) का श्राद्ध दोहित्र (धेवते) को करना चाहिये।

महालय श्राद्ध तिथियाँ—
01. पूर्णिमा श्राद्ध— 07/09/2025, रविवार,
02. प्रतिपदा श्राद्ध— 08/09/2025, सोमवार,
03. द्वितीया श्राद्ध— 09/09/2025, मंगलवार,
04. तृतीया श्राद्ध— 10/09/2025, बुधवार,
05. चतुर्थी व पंचमी श्राद्ध— 11/09/2025, गुरुवार,
06. षष्ठी श्राद्ध— 12/09/2025, शुक्रवार,
07. सप्तमी श्राद्ध— 13/09/2025, शनिवार,
08. अष्टमी श्राद्ध— 14/09/2025, रविवार,
09.नवमी श्राद्ध— 15/09/2025, सोमवार,
10. दशमी श्राद्ध— 16/09/2025, मंगलवार,
11. एकादशी श्राद्ध— 17/09/2025, बुधवार,
12. द्वादशी श्राद्ध— 18/09/2025, गुरुवार,
13. त्रयोदशी श्राद्ध— 19/09/2025, शुक्रवार,
14. चतुर्दशी श्राद्ध— 20/09/2025, शनिवार,
15.सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध— 21/09/2025, रविवार,
16. मातामह श्राद्ध— 22/09/2025, सोमवार।

लेखक आचार्य राहुल वाशिष्ठ (पुराणेतिहासाचार्य, ऐम.ए., बी.ऐड., टी.ई.टी.),
आदितीर्थ श्री सूकरक्षेत्र धाम, सोरों जी (कासगंज), उ०प्र०।

Soron Live 24
Author: Soron Live 24

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