सूकर क्षेत्र में तर्पण-श्राद्ध से पितरों को मिलती है मोक्ष की प्राप्ति

वराह पुराण में सूकर क्षेत्र की महिमा का वर्णन, जल, थल और अंतरिक्ष तीनों में मुक्ति का उल्लेख — आचार्य पं. शशिधर द्विवेदी
सोरों (कासगंज)।( लेखक सचिन उपाध्याय)पितृपक्ष के अवसर पर तीर्थ नगरी सोरों जी में हरिपदी गंगाजी के घाटों पर पितरों की मोक्ष-कामना को लेकर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु सोरों पहुंचकर अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान सहित विभिन्न धार्मिक कर्मकांड कर रहे हैं।
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक चलने वाले पितृपक्ष में पितरों की शांति एवं सद्गति के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। इसी क्रम में सूकर क्षेत्र धाम सोरों जी में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पितरों की मोक्ष-कामना से पहुंचते हैं।
आचार्य पं. शशिधर द्विवेदी ने सूकर क्षेत्र की धार्मिक महत्ता बताते हुए कहा कि वराह पुराण में माता पृथ्वी से संवाद के दौरान भगवान वराह द्वारा सूकर क्षेत्र की महिमा का वर्णन किया गया है।
उन्होंने बताया कि शास्त्रों में कहा गया है—
“गयायाश्च थले मुक्ति, वाराणस्यां जले स्थले।
जले स्थले च अन्तरिक्षे त्रिधामुक्तिः शूकरे॥”
अर्थात गया में थल पर, वाराणसी (काशी) में जल में तथा सूकर क्षेत्र में जल, थल और अंतरिक्ष—तीनों में मुक्ति की प्राप्ति का उल्लेख किया गया है।

आचार्य द्विवेदी के अनुसार सूकर क्षेत्र में पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों की मोक्ष एवं सद्गति की कामना की जाती है। यही कारण है कि पितृपक्ष के दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु हरिपदी गंगाजी के घाटों पर पहुंचकर अपने पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं।
Author: Soron Live 24

